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जैरोम ब्रुनर का संज्ञानात्मक सिद्धान्त
- यह एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे।
- इनका मानना था की संज्ञानात्मक क्षैत्र जिसमें स्मरण, स्मृति, चिन्तन, तर्क आते है अनका विकास मानसिक प्रक्रिया से हो।
- संज्ञानात्मक क्षैत्र के आयाम- बुद्धि व मानसिक विकास है।
- यह सिद्धान्त जीन पियाजे के संज्ञानात्मक सिद्धान्त का एक विकल्प है।
- जैरोम ब्रुनर ने सर्वाधिक महत्व शिक्षा पर दिया है।
- इन्होंनें इस सिद्धान्त के अनुसार तीन अवस्थाऐं बताई है-
क्रियात्मक अवस्था - जन्म से 2 वर्ष तक-
- इस अवस्था में बालक गामक व शारीरिक क्रियाऐं करता है जैसे चलना, दोड़ना आदि
- वातावरण के प्रति प्रतिक्रिया करता है।
- ज्ञान के आधार पर कोई कार्य नहीं करता है।
प्रतिबिम्बात्मक/प्रतिमा आधारित अवस्था- 3 वर्ष से 7 वर्ष तक
- इस अवस्था में बालक सुचनाएं समप्रत्यय के द्वारा मानसिक प्रतिबिम्बों के आधार पर प्राप्त करता है।
- समप्रत्यय का मतलब मस्तिष्क में बनने वाला बिम्ब होता है।
- इस अवस्था में भाषा का महत्व होता है।
- इस अवस्था में बालक चमक, गति, सौर, ध्वनि के प्रति आकर्षित होता है।
चिह्न आधारित अवस्था/संकेत आधारित अवस्था- 7 वर्ष से 15/16 वर्ष तक
- इस अवस्था में बालक प्रत्यक्षीकरण व क्रियात्मक रूप/बौद्धिक तरीके के द्वारा सीखता है।
- अमूर्त चिन्तन करता है।
जीन पियाजे और जैरोम ब्रुनर के संज्ञानात्मक सिद्धान्त में अन्तर-
- जीन पियाजे के संज्ञानात्मक सिद्धान्त में 4 अवस्थाऐं है लेकिन जैरोम ब्रुनर के संज्ञानात्मक सिद्धान्त में 3 अवस्थाऐं है।
- जीन पियाजे ने वातावरण पर अधिक महत्व दिया है लेकिन जैरोम ब्रुनर ने शिक्षा पर अधिक महत्व दिया है।
- जीन पियाजे के अनुसार व्यक्ति व वातावरण के मध्य अन्तःक्रिया होती है लेकिन जैरोम ब्रुनर के अनुसार व्यक्ति की शिक्षा, संस्कृति व सभ्यता के मध्य अन्तःक्रिया होती है।
- जैरोम ब्रुनर का कहना है कि एक बालक नग्न बंदर की तरह नग्न नहीं बल्कि संस्कृति युक्त होता है।
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