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मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त
सिग्मण्ड फ्रायड एक डाॅक्टर थे। जिनका जन्म पेरीस के पेन्सीनगर में हुआ। उन्होंनें पागलों पर अध्ययन किया और मन की तीन दशाऐं और तीन व्यक्तित्व अवस्थाऐं भी बताई।
सिग्मण्ड फ्रायड के अनुसार मन तीन प्रकार के होते है- अचेतन मन, अर्द्धचेतन मन और चेतन मन
सिग्मण्ड फ्रायड के अनुसार व्यक्तित्व के तीन प्रकार के होते है- इद्म, अह्म, परम अह्म
अचेतन मन
- मन का 9/10 भाग अचेतन मन होता है।
- अचेतन मन कटू अनुभूतियों, दुखद बातों, दमित इच्छाओं, योन उर्जा, मुल प्रवृतियों, सवेंगो, भावनाओं, अनैतिक अमर्यादित असामाजिकता का भण्डार है।
- जन्मजात, आनन्द और सुख का नियम लागु होता हैं
- अचेतन मन आनन्दवादी या सुखवादी प्रवृति का मन है।
- इसे तार्किक मन भी कहते है।
- यह जन्मजात व अनुवांशिक होता है।
अर्द्धचेतन मन
- यह अचेतन व चेतन मन के मध्य की अवस्था है।
- अर्द्धचेतन मन याद कि गई बातें अचानक भुल जाता है।
- अर्द्धचेतन मन के कारण अटक जाना, हकला जाना आदि।
- इसमें वास्तविकता का नियम लागु होता है।
- वास्तविक समय का ज्ञान रहता है।
- यह अर्जित है।
चेतन मन
- मन का 1/10 भाग चेतन मन होता है।
- यह नैतिकता के नियम पर आधारित होता है।
- यह नैतिकवादी/आदर्शवादी मन है।
- चेतन मन में नैतिक मुल्यों का भण्डार होता है।
- चेतन मन बच्चों में सामाजिकरण की अहम भूमिका अदा करता है।
- चेतन मन आध्यात्मीक प्रवृति की और रूझान रखने वाला मन है।
व्यक्तित्व की तीन अवस्थाऐं
इद्म
- इद्म के अन्दर इच्छाओं का भण्डार होता है।
- यह अचेतन मन से सम्बन्धित होता है।
- इद्म के कारण ही अनैतिक व अपराध कार्य होते हैं।
- कुसमायोजन के लिए भी इद्म ही जिम्मेदार है।
- इसके कारण मनुष्य पशु प्रवृति का हो जाता है।
- इद्म आनन्दवादी/सुखवादी प्रवृति का व्यक्तित्व है।
- यह जन्मजात व अनुवांशिक होता है।
अह्म
- अह्म व्यक्ति का घनिष्ट मित्र है।
- अह्म व्यक्ति को बचाने का कार्य करता है।
- इद्म और परम्अह्म के मध्य संतुलन का कार्य करता है।
- अह्म समायोजन का कार्य करता है।
- अह्म व्यक्तित्व का कार्य पालक है।
- अह्म वास्तविकता के सिद्धान्त पर कार्य करता है।
- अह्म अर्जित होता है।
परम अह्म
- परम अह्म चेतन मन से सम्बन्धित होता है।
- परम अह्म बुरे विचारों को रोकने का कार्य करता है।
- परम अह्म आदर्शवादी नियम पर कार्य करता है।
- परम अह्म आदर्शवादी/नैतिकवादी बातें करता है।
सिग्मण्ड फ्रायड ने मन की तुलना बर्फ के शिलालेख जो समुद्र में तैर रहा है उससे की है।
सिग्मण्ड फ्रायड ने निम्न तीन किताबे लिखी है।
स्वपन विश्लेषण, इद्म और अह्म, अचेतन मन
सिग्मण्ड फ्रायड ने दो मुल प्रवृतियां बताई है।
जीवन की मुल प्रवृति- जिजीविषा- यह रचनात्मक और निर्माणकारी कार्य करती है।
मृत्यु की मुलप्रवृति- मूमूर्षा- विध्वंसकारी और आक्रामणकारी कार्य करती है।
अपने आप से प्रेम करने तथा अपने आप में मस्त रहने कि क्रिया को नार्सिजिज्म या स्वमोह कहते है। यह प्रवृति शैशवावस्था में सर्वाधिक पाई जाती है।
ऑडिपस व इलेक्ट्रा ग्रंथि - सिग्मण्ड फ्रायड के अनुसार लडकों में ऑडिपस ग्रंथि होने के कारण वे अपनी मां से अधिक प्रेम करते है। तथा लडकियां में इलेक्ट्रा ग्रंथि विकसित होने के कारण वे अपने पिता से अधिक प्रेम करती है।
लिबिडों- सिग्मण्ड फ्रायड ने काम प्रवृति को लिबिडों कहा है। उनके अनुसार यह एक स्वभाविक प्रवृति होती है और यदि इस प्रवृति का दमन करने की कौशिश की जाती है तो व्यक्ति कुसमायोजित हो जाता है।
मनोलैगिंक विकास सिद्धान्त
प्रवर्तक- सिग्मण्ड फ्रायड
इस सिद्धान्त के अनुसार गालक के विकास में काम प्रवृति का व्यापक प्रभाव पड़ता है।
काम प्रवृति जन्म से पायी जाती है।
काम प्रवृति भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न स्वरूप में होती है।
सिग्मण्ड फ्रायड के अनुसार काम प्रवृति की 5 अवस्थाऐं होती है-
मुखीय अवस्था- 0 से 1 वर्ष तक - इस अवस्था में काम प्रवृति मुख के क्षैत्र में केन्द्रीत होती है। इस अवस्था में बालक अंगुठा चुसना जैसे कार्य करते है।
गुदीय अवस्था- 1 से 3 वर्ष तक - इस अवस्था में काम प्रवृति गुदा क्षैत्र में केन्द्रीत होती है। इस अवस्था में बालक जिद्दी, आक्रामक व धारणात्मक हो जाता है।
लैगिंक अवस्था- 3 से 6 वर्ष तक - इस अवस्था में ऑडिपस व इलेक्ट्रा ग्रंथि का विकास हो जाता है। इस अवस्था मंें बालकांें का ध्यान जननांगों की तरफ चला जाता है।
प्रसुप्ति अवस्था- 7 से 12 वर्ष तक - इस अवस्था में काम प्रवृति अदृश्य हो जाती है। यह शरीर के किसी भी भाग मंें विद्यमान नहीं होती है।
जननेन्द्रिय अवस्था- 12 वर्ष के बाद - इस अंतिम अवस्था में काम शक्ति का प्रयोग सन्तानोत्पत्ति हेतु किया जाता है।