शैशवावस्था

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 शैशवावस्था

श्रीमती हरलाॅक:- जन्म से 2 सप्ताह को शैशवावस्था नाम दिया। इस अवस्था को नवजात शिशु की संज्ञा भी दी जाती है।

इस अवस्था में शिशु 80 प्रतिशत समय सोने में निकालता है।

2 सप्ताह से 2 वर्ष को बचपनावस्था नाम दिया है तथा 3 से 6 वर्ष को पुर्व बाल्यावस्था नाम दिया है।

शैशवावस्था एक खतरनाक काल एवं अपीली काल है।

जेंस:- इन्होंने जन्म से 6 वर्ष शैशवावस्था नाम दिया।

राॅस:- जन्म से 2 वर्ष को शैशवावस्था व 2 से 6 वर्ष को पूर्व बाल्यावस्था कहा।

वेलेन्टाइन:- शैशवावस्था सिखने का आदर्श काल है।

जाॅन लाॅक:- शिशु का मस्तिष्क कोरी स्लेट ’’तबुला रासा’’ होती है।

फ्रायड:- 4-5 वर्ष में बालक वह बल जाता है जो भावी जीवन में बनता है।

गुड एनफ:- व्यक्ति का मानसिक विकास जितरा होता है उसका आधा 3 वर्ष तक हो जाता है।

उपनाम

  • जीवन का सबसे महत्वपुर्ण काल। 
  • भावी जीवन की आधारशीला। 
  • सीखने का आदर्शकाल।
  • संस्कार निर्माण अवस्था।
  • सीचाने की आयु।
  • मन के मौजों में विचरण करने की अवस्था।
  • नाजुक अवस्था।
  • अतार्किक चिन्तन की अवस्था।
  • प्रिय लगने वाली अवस्था।
  • गढने योग्य /क्षणीक सवेंग अवस्था।
  • खिलोनों की आयु।
  • टोली पुर्व अवस्था।
  • शालापुर्व/पुर्व विघालयी आयु।
  • नर्सरी स्कुल आयु।
  • अनुकरण से सीखने की अवस्था।
  • प्रारम्भिक विघालय की पुर्व तैयारी की अवस्था।

सर्वप्रथम विकासात्मक कार्य का समप्रत्यय शिकागो युनिवर्सिटी के प्रोफेसर हैविगहस्र्ट के द्वारा दिया गया।

विकासात्मक कार्य से तात्पर्य बालक की उम्र व अवस्था के अनुसार कार्य करते है।

कार्य या विशेषताऐं

  • शारिरीक व मानसिक विकास तीव्र गति से।
  • जिज्ञासा की प्रवृति।
  • सीखने की प्रक्रिया मे तीव्रता।
  • दूसरों पर निर्भरता।
  • सीमित मात्रा में कल्पना।
  • दूसरें शिशुओं में रूची।
  • दोहराने की प्रवृति।
  • अनुकरण द्वारा सीखने प्रवृति।
  • क्षणीक मित्रता।
  • मित्रों कि संख्या 1 या 2।
  • स्वकेंद्रित /स्वार्थी/आत्मप्रेम की भावना।
  • सुबोपली-सुनना, बोलना, पढना, लिखना का विकास।
  • संवेगों का प्रदर्शन।
  • मुलप्रर्वत्यात्मक व्यवहार।
  • नैतिक व सामाजिक भावना का अभाव।
  • न तो सामाजिक न ही असामाजिक।
  • कहानी सुनना, सुनाना।
  • 4 वर्ष तक- मलमुत्र विसर्जन पर नियंत्रण।
  • 2 वर्ष तक - मलमुत्र विसर्जन का संकेत।
  • काम प्रवृति - सिग्मण्ड फ्रायड।

शारीरिक विकास

  • 1 माह- शिशु सिर उठाने लगता है।
  • 4 माह- सहारे से बैठने लगता है।
  • 7 माह- बिना सहारे के बैठने लगता है।
  • 10 माह- घुटनों पर चलने लगता है।
  • 14 माह- खड़ा होने लगता है।
  • 15 माह- पेरों से चलने लगता है।


मानसिक विकास

  • 1 माह- भूख, प्यास, निद्रा अन्य शारीरिक आवश्यकता होने पर बालक हाथों और पेरो सक क्रिया करता है, रोने और चिल्लाने लगता है।
  • 2 माह- ध्वनी के प्रति प्रतिक्रिया करता है।
  • 4 माह- वस्तुओं को पकडनें लगता हैं। अनेक आवाज निकलता है। परिवार नाम पहचानने लगता है।
  • 6 माह- सुनी हुई आवाज की नकल करता है। अपना नाम पहचानने लगता है।
  • 8 माह- खिलौनो के साथ खेलने लगता है। खिलौनो को छिछने पर रोने लगता है।
  • 10 माह- शब्द बोलने लगता है।
  • 14 माह-प्रथम सार्थक शब्द बोलने लगता है।
  • 20 माह- एक वाक्य बोलने लगता है।
  • 3 वर्ष- 4-7 वाक्य बोलने लगता है। गिनती, संख्या बोलने लगता है। रेखाऐं बनाता है।
  • 4 वर्ष- जिज्ञासा प्रबल होती हैं चित्र, रेखाऐं बनाने लगता है। कई प्रकार के व कई बार प्रश्न पुछता है। हल्की व भारी वस्तुओं में अन्तर करना सीख जाता है।
  • 6 वर्ष- 15 से 20 तक पहाड़े, व्याकरण कि दृष्टि से शुद्ध वाक्य बोलने लगता है।


संवेगात्मक विकास

जन्म के समय ’उत्तेजना’ सवेंग पाया जाता है।

जे. बी. वाटसन- जन्म के समय शिशु मे तीन क्रोध, भय, प्रेम नामक सवेंग पाये जाते है।

शैशवावस्था में शिशु का व्यवहार सवेंगों की अभिव्यक्ति करता है।

जन्म के समय सवेंग तिव्र व नकारात्मक होते है। आयु बढने पर- सकारात्मकता की ओर।

ब्रिजेश के अनुसार- 3 माह में कष्ट और आनन्द

                 6 माह में क्रोध, भय औा घृणा

                12 माह में स्नेह और उल्लास नामक सवेंग होते है।


सामाजिक विकास

बालक समाज के गुण, मान्य व्यवहार और नियम का परिमार्जन करता है। तथा अवगुण, अमान्य व्यवहार आदि का त्याग करता है।

जन्म के समय बालक में सामाजिकता व नैतिकता में शुन्य होते है।

अगर शिशु में मानसिक विकास घटित होगा तो उसमें सामातीकरण मान्य होगा।

  • 3 माह- मां को पहचानने लगता है।
  • 4 माह- अभिभावकों को देखकर पहचानने व हसने लगता है।
  • 5 माह- अपरिचितों से डरता है- प्रेम व क्रोध मे अन्तर
  • 1 वर्ष- परिवार के साथ घुलमिल जाता है।
  • 2 वर्ष- परिवार के कुछ कार्य करता है।
  • 3 वर्ष- पड़ौसी बच्चों के साथ खेलनें लगता है।
  • 4 वर्ष- विघालयी आगमन।
  • 5 वर्ष- औपचारिक शिक्षा आरम्भ। वर्तमान का भय बना रहता है।

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