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बाल्यावस्था
ब्लेयर जोन्स व सिम्पसन- बाल्यावस्था वह काल है जब व्यक्ति के बुनियादी दृष्टिकोण, मुल्य तथा आदर्श एक बड़ी सीमा तक निरूपित किए जाते है।
राॅस- बाल्यावस्था छद्म मिथ्या परिपक्वता का काल है।
किलपेट्रिक- बाल्यावस्था प्रतिद्वन्दात्मक सामाजिकरण का काल है।
काॅल एण्ड ब्रुस- बाल्यावस्था एक अनोखा काल है।
स्टेन या स्टैंग- ऐसा शायद ही कोई खेल हो जिसे 10 वर्ष का बालक ना खेलता हो।
शैक्षिक दृष्टिकोण से जीवनचक्र में बाल्यावस्था से महत्वपुर्ण कोई अवस्था नहीं है।
उपनाम
- आरम्भिक विघालय की आयु ।
- गन्दी अवस्था।
- स्फुति की अवस्था।
- ज्ीवन का अनोखा काल।
- निर्माणकारी अवस्था।
- मूर्त चिन्तन/ तार्किक चिन्तन की अवस्था।
- खेल की आयु
- टोली/समुह की अवस्था।
- वैचारिक क्रिया कि अवस्था।
- मुर्त संक्रियात्मक अवस्था।
- छद्म मिथ्या परिपक्वता काल।
- प्रतिद्धन्दात्मक सामाजिकरण काल।
- उत्पाती अवस्था।
- शैक्षणीक दृष्टिकोण से महत्वपुर्ण काल।
- तीव्र शारीरिक क्रियाशीलता अभिवृद्धि का काल।
कार्य या विशेषताऐं
- मानसिक व शारीरिक विकास में स्थिरता
- जिज्ञासा प्रवृति प्रबल
- यर्थाथवादी दृष्टिकोण।
- रचनात्मक प्रवृति का विकास।
- निरूद्देश्य भ्रमण।
- संग्रह करने की प्रवृति।
- चोरी करना व झुठ बोलना।
- भाई-बहिनो से झगड़ा।
- बर्हिमुखता आने लगती है।
- प्रतिस्पर्धा की भावना ।
- प्रशंसा पाने की इच्छा।
- पक्षपात की भावना का शिकार।
- हीन भावना का शिकार।
- सवेंगों पर नियंत्रणं
- नैतिक व सामाजिक भावना का विकास।
- व्यवहार में चंचलता कम होने लगती हैै।
- कार्य-कारण में सम्बन्ध स्थापित।
- आत्मनिर्भरता पायी जाती है।
- समलिंग समुह भावना होना।
- खेलों में रूची।
- मुर्त चिन्तन की योग्यता।
- सवेदनशीलता/ तर्क/ स्मरण/ चिंतन/ मनन आदि करने लगता है।़
- बालक की रूचिंयों में परिवर्तन।
- अभिरूचि परिवर्तन की अवस्था।
- योवन उर्जा निष्कर्य या सुस्त रहती है।
शारीरिक विकास
प्रतिवर्ष 5 से 6 से.मी. शरीर की लम्बाई में वृद्धि होती है।
मानसिक विकास
- 7 वर्ष- छोटी-छोटी बातों का उल्लेख, समानता और अन्तर की समझ।
- 8 वर्ष- कहानियां सुनाने लगता है।
- 9 वर्ष- समय, दिन, दिनांक वर्ष आदि को समझने लगता है।
- 10 वर्ष- बालक घुर्त गति से पढ़ने लगता है। तार्किक और निरीक्षण क्षमता विकसित होने लगती है।
- 11 वर्ष- कठिन शब्दों को समझनें लगता है।
- 12 वर्ष- तर्क करने लगता है। कार्य-कारण स्थापित करने सीख जाता है।
सवेंगात्मक विकास
- सामाजिकरण की अवस्था, तीव्र सवेंग पर नियत्रण सीख जाता है।
- तीव्र सवेंगों में कमी आने लग जाती है।
- बुद्धि के द्वारा सवे्रगों में नियत्रण। द्धेष की भावना विकसित
- ईच्छा की पुर्ती न होने पर निराशा उत्पन्न होती है।
- बराबरता नहीं होने पर द्धेष की भावना, असफलता से प्राप्त भय बना रहता है।
- आनन्द सुख उल्लास प्रफुल्लता का विकास।
- नकारात्मक सवेंगों में कमी व सकारात्मक सवेंगों में बढ़ोतरी।
सामाजिक विकास
- समुह/टोली की अवस्था
- सहयोग, मित्रता, सद्भावना, सम्मान जैसे मुल्यों का विकास।
- सामाजिक विकास परिवार से आरम्भ, खेल से मजबूत होता है, विघालय में बर्हिमुखता आती है।
- नकारात्मक मन का आरम्भ जैसे चोरी, झुठ, बहाने बनाना लगता है।
- उनके आदर्शो व विचारों को अपनाता है।
- समलिगीं भावना- बालक का मित्र बालक व बालिका का मित्र बालिका।
- बालक स्वयं मित्र का चयन करता है। प्रशसां प्राप्ती की तीव्र ईच्छा।
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