BLOOD GROUP ( रक्त समूह )

रक्त समूह की खोज का क्षेर्य कार्ल लेंडस्टिनर को जाता है जिसने 1901 में ये कार्य किया था।


रक्त समूह 4 प्रकार के होते है। A , B, AB, और O

AB और O रक्त समूह की खोज स्टूर्ली व डिकोस्टले ने 1902 में की थी।


O रक्त समूह को सर्वदाता एवम AB रक्त समूह को सर्वग्राही कहते है।


O(-VE ) को रक्तसमूह का सर्वदाता तथा AB(+VE) को रक्त समूह का सर्वग्राही कहते है।


रक्त में प्रतिजन ओर प्रतिरक्षी मौजूद होते है इनके आधार पर ही रक्त समूह को बांटा गया है।


प्रतिजन दो प्रकार के होते है जिन्हें A और B से दर्शाया जाता है।


प्रतिरक्षी भी दो प्रकार के होते है जिन्हें a और b से दर्शाया जाता है।


A समूह में A प्रतिजन और b प्रतिरक्षी उपस्थित होते है।


B समूह में B प्रतिजन ओर a प्रतिरक्षी  उपस्थित होते है।


AB समूह में A,B दोनो प्रतिजन उपस्थित होते है प्रतिरक्षी अनुपस्थित रहता है।


O समूह में a,b दोनो प्रतिरक्षी उपस्थित होते है प्रतिजन अनुपस्थित रहते है।


रक्त के लेने देने की स्थिति


रक्त समूह में दाता व ग्राही के एंटीजन व एंटीबाडी अलग-अलग होने चाहिए। अगर समान होंगे तो रक्त कणिकाएं आपस मे चिपक जाती है। और ग्राही व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।


अगर रक्त में से रक्त कणिकाएं निकाल ले तो प्लाज्मा शेष बचता है।


अगर रक्त में से प्लाज्मा निकाल ले तो रक्त कणिकाएं ही शेष बचेगी।


प्लाज्मा में से फाइब्रिनोजन को अलग कर ले तो सीरम ही शेष बचता है।


अगर रक्त कणिकाओं में से भी RBC को अलग कर ले तो ये भी सीरम ही बचेगा।

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