शेरशाह सूरी
शेरशाह सूरी का परिचय
सूर वंश की स्थापना शेरशाह सूरी ने की, इसका बचपन का नाम फरीद था और इसके पिता का नाम हसन था।
जौनपुर के खाने आजम जो कि वहाँ के शासक थे जिनका नाम था जमाई खाँ सुरवानी इन्होंने हसन को (शेरशाह के पिता को) सासाराम खवासपुर की जागीर सौंपी थी।
शेरशाह का मकबरा
सासाराम बिहार में स्थित है यहीं पर शेरशाह का मकबरा स्थित है यह मकबरा बहुत ही प्रसिध्द है क्योकि यह हिंदू ईरान वास्तु कला का समंवय है यह मकबरा सासाराम में एक तालाब के बीच ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ है।
1527 औए 1528 में बिहार के शासक मुहम्मद खाँ नोहानी (मुहम्मद शाह) के दरबार में से लाया गया जिसने उसे अपना वकील और अपने बेटे जलाल खां नोहानी के लिए अटाली नियुक्त किया यहीं उसे एक बाघ मारने के लिए शेर खां की उपाधि दी गई घाघरा की लडाई में महमूद लोदी का इसने साथ दिया 1530 में हजरत-ए-आला बन कर उसने गद्दी छीन ली।
शेर खां ने किससे विवाह किया
एक लार्ड मलिका थी जो कि चुनार के किलेदार ताज खां की विधवा थी इससे शेर खां ने शादी कर ली और चुनार के किले पर अधिकार कर लिया।
हुमायुँ ने जब चुनार गढ के किले पर आक्रमण किया तो शेरशाह ने 1539 ई. में चौसा पर कब्जा कर लिया इसी वर्ष शासक के रूप में शेरशाह की उपाधि धारण की।
कौन सा विद्रोह दबाया
1540 में कन्नौज के बाद लाहौर में पर कब्जा जमाया 1541 में बंगाल के शासक खिज्र खां के विद्रोह को दबाया और बंगाल में नबाब पध्द्ति खत्म करके उसे जिलों में विभक्त कर दिया।
शेरशाह की मृत्यु
1545 में कलिंजर फतह के दौरान इसकी मृत्यु हो गई जहाँ बारूद में विस्फोट हो गया था और इन्होने वहीं अपनी अंतिम सांस ली परंतु इन्होंने कलिंजर का किला जीत लिया।
शेरशाह ने क्या क्या कार्य किये
शेरशाह व्यक्तिगत रुप से सुन्नी मुसलमान था शेरशाह ने लोक कल्याणकारी कार्य करते हुए सडकें व सरायें बनवायी ।
पहली सडक लाहौर से सोनार गांव (बंगाल) तक जाती थी जो सबसे लम्बी सडक थी यह सडक ‘सडक-ए-आजम’ कहलाती थी इसी सडक का नया नाम ग्राण्ड ट्रंक रोड है।
शेरशाह धार्मिक रुप से सहिष्णु शासक था इसने सैनिक व्यवस्था में भी अनेक सुधार किये ।
अलाउद्दीन खिलजी के सैनिक
सुधारों से काफी प्रभावित थे जैसे- नकद वेतन देना।
शेरशाह ने घिसे-पिटे सिक्कों के स्थान पर सोने,चाँदी व ताँबे के सिक्कों का प्रचलन करवाया व ताँबे का दाम चलवाया।
लगान की व्यवस्था
इसके समय लगान की व्यवस्था रैय्यतवादी थी इसके समय में आय का सबसे बडा स्त्रोत भूमि पर लगने वाला कर था।
शेरशाह बुधवार का दिन मुकदमों की सुनवाई करता था इसने अपने सम्पूर्ण शासन क्षेत्र में एक समान नाप तौल व मुद्रा प्रणाली लागू की।
मलिक मुहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’, ‘अखरावट’, ‘बारहमासा’, ‘आखिरीकलाम’ ये शेरशाह के काल में रची गई है।
शेरशाह ने प्रत्येक परगने में एक कानूनगो नियुक्त किया जिससे परगने की स्थिति की जानकारी लेता था।
अब्बास खां शेरवानी की तारीख-ए-शेरशाही से शेरशाह के जीवन व कार्यकलापों की जानकारी मिलती है ।